Monday, July 16, 2012

List of state and union territory capitals in India

Capitals of Indian States.

भारत के राष्ट्रीय प्रतीक(चिन्ह)

भारत का राष्ट्रीय पशु – टाइगर
बाघ भारत के वन्य जीवन के धन का प्रतीक है।

भारत का राष्ट्रीय पक्षी – मयूर
मयूर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है यह सौंदर्य अनुग्रह जैसे गुणों का प्रतीक है।

भारत का राष्ट्रीय जलचर – गंगा डॉल्फिन
गंगा डॉल्फिन पवित्र के रूप में गंगा की पवित्रता का प्रतिनिधित्व करने के लिए कहा जाता है। क्योकि यह शुद्ध और ताजा पानी में ही जीवित रह सकते हैं।

भारत का राष्ट्रीय फल – आम
आम राष्ट्रीय फल है। और अत्यंत ही मीठा होता है। आम की अति प्राचीन काल से भारत में खेती की जाती है। इसकी 100 से अधिक किस्में हैं।
  
भारत का राष्ट्रीय पुष्प – कमल
वैज्ञानिक तौर पर Nelumbo Nucifera के रूप में जाना जाता है। कमल भारत का राष्ट्रीय फूल है और यह एक पवित्र फूल है। धन ज्ञान और आत्मज्ञान भूल का प्रतीक है। यह कीचड़ में खिलकर भी स्वच्छ होता है। जो दिल और मन की पवित्रता का प्रतीक है।

भारत का राष्ट्रीय पेड़ – बरगद
भारत का राष्ट्रीय पेड़ बरगद है। यह एक विशाल पेड़ है। जो अपने आस पास के वृक्ष और राहगीर को छाया प्रधान करता और हिन्दुओ में इसे पूजा जाता है।

भारत के राष्ट्र पिता – महात्मा गांधी
सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस द्वारा “राष्ट्र के पिता” के रूप में 4 जून १,९४४ में रंगून से आजाद हिंद रेडियो पर संबोधित किये गए बाद में भारत सरकार द्वारा मान्यता दी गई।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज  – तिरंगा
राष्ट्रीय ध्वज क्षैतिज तिरंगा शीर्ष पर  गहरा भगवा (केसरी) और नीचे गहरे हरे रंग  होता है। मध्य में सफेद  जिसपर अशोक चक्र होता है। इसके इसकी लम्बाई चौडाई का अनुपात ३:२ होता है।

भारत का राष्ट्रीय खेल – हॉकी
हॉकी में भारत का आठ ओलंपिक स्वर्ण पदक के साथ एक प्रभावशाली रिकॉर्ड है। आधिकारिक तौर पर हॉकी राष्ट्रीय खेल है।

भारत का राष्ट्रीय गान – जन – गण – म..
जन – गण – मन गीत मूल रूप से बंगाली में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित है। इसके हिन्दी संस्करण को  राष्ट्रीय गान के तौर पर अपनाया गया है।

राष्ट्रीय कैलेंडर – शक संवत
राष्ट्रीय कैलेंडर शक युग चैत्र के साथ अपनी पहली महीने के रूप में और 365 दिनों की एक सामान्य वर्ष के आधार पर 22 मार्च 1957 से अपनाया गया यह ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ में प्रयोग किया जाता है।

 भारत का राष्ट्रीय गीत – वंदे मातरम्
गीत वंदे मातरम् बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा संस्कृत एवं बंगला में 1882 में रचित प्रेरणा किया जो के स्रोत है।  इस गीत ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी गीत के पहले दो छंद को भारत गणराज्य के राष्ट्रीय गीत का आधिकारिक दर्जा दिया गया जो संस्कृत में है।

 भारत के राष्ट्रीय प्रतीक
भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सारनाथ में अशोक के बौद्ध शेर राजधानी (अशोक स्तम्भ का उपरी) है।  इसमें चार एशियाई शेर एक दूसरे के विपरीत दिशा में चारो दिशाओ की सुरक्षात्मक मुद्रा में है। सारनाथ भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में बनारस के पास है। भारत के प्रतीक के नीचे आदर्श वाक्य देवनागरी स्क्रिप्ट में “सत्यमेव जयते” उदित हैं – जिसका मतलब “सत्य की सदा ही जीत होती है”

भारतीय राष्ट्रीय नदी – गंगा नदी
गंगा भारत की सबसे लंबी नदी है। गंगा नदी पृथ्वी पर सबसे पवित्र नदी के रूप में हिंदुओं द्वारा प्रतिष्ठित है। किसी और नदी के मुकाबले दुनिया में सबसे भारी आबादी गंगा नदी के पास बसी है।

भारत की राज भाषा – हिंदी
हिंदी भारत देश की राज भाषा है। और विश्व में दूसरे नंबर की सब से ज्यादा लोगो  बोली जाने वाली भाषा है।

Monday, October 24, 2011

Friday, August 12, 2011

बैसी यानी देव अवतरण की अलौकिक गाथा


ढोल की गर्जना, नगाड़ों की अंतर्मन को झंकृत करती टंकार। धूणी (एक किस्म का अग्निकुंड) के चारों तरफ दुलैंच यानी विशेष गद्दी में बैठे तपस्वियों के शरीर पर आ ान के साथ लोक देवताओं का अवतरण। यही है कौतुहल से भरी देवभूमि की पारंपरिक व धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ी बैसी, जो देव अवतरण की अलौकिक गाथा और उत्तराखंडी सांस्कृतिक विरासत को खुद में समेटे है। दरअसल, केदारखंड व मानसखंड के लोक देवताओं के आ ान की पौराणिक परंपरा बैसी का आयोजन श्रावण मास में ही होता है। चूंकि देवभूमि के समस्त लोक देवता मसलन, न्याय देवता गोलज्यू महाराज, गंगनाथ, शैम आदि का निवास स्थान हिमालय माना जाता है, लिहाजा साझ की गोधुली बेला पर दास व डंगरिए (देवदूतों के रूप) ढोल व नगाड़ों की मिश्रित गर्जना व टंकार की झंकृत करने वाली धुन के बीच वीर गाथा के जरिए आ ान करते हैं। खास प्रांगण पर चारों तरफ लोक देवताओं के अवतरण को दुलैंच यानी विशेष गद्दी बिछी होती है। इसमें अक्षत, पुष्प एवं भेंट रखी जाती है। वीर रस की हुंकार जब चरम पर पहुंचती है तो देवों का अवतरण दुलैंच पर बैठे तपस्वियों के शरीर पर होने लगता है। खास बात है, दास व डंगरिए इस बीच लोक देवताओं के शौर्य, पराक्रम, अन्याय के खिलाफ जंग, कठिन परिश्रम आदि का बखान करते हैं। देवअवतरण पूर्ण होने पर फिर दौर शुरू होता दीन-दुखियों की फरियाद सुनने का। आसमान को छूती लपटों वाली धुणी में तप कर लाल हुआ चिमटे को लोक देवता का अवतारी चाट कर या शरीर पर पीट शांत करता है। यह सब हैरतअंगेज होता है। अंगारों पर चलना और उन्हें निगल जाना तो और भी भयंकर। मगर इससे अवतारी को तनिक भी क्षति नहीं पहुंचती। 22 दिन की घोर तपस्या यानी बैसी के अंतिम दिन लोक देवताओं को पुन: हिमालय के लिए रवाना किया जाता है।
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Tuesday, June 28, 2011

अमरत्व के नाथ

मान्यता है कि पार्वती को अमरत्व की कथा सुनाने के लिए शिव ने जिस निर्जन स्थल का चयन किया था, वही अमरनाथ गुफा है। आज से अमरनाथ यात्रा आरंभ हो रही है, इस अवसर पर जानिए इस यात्रा का माहात्म्य..

एक पौराणिक आख्यान है कि मां पार्वती ने एक बार भगवान शिव से उनके मुंडमाला पहनने का कारण पूछा। शिव ने कहा, 'जब भी तुम जन्म लेती हो, मैं इसमें एक मुंड और जोड़ लेता हूं।' इस पर पार्वती सोचने लगीं कि साक्षात शक्ति होते हुए भी मुझे बार-बार जन्म लेना पड़ता है, परंतु भगवान शिव अजर-अमर हैं। मां पार्वती शिव से उनके अमरत्व का रहस्य जानने को व्याकुल हो उठीं। भगवान शिव नहीं चाहते थे कि उनके अलावा कोई और अमरत्व के रहस्य सुने, इसलिए वे ऐसे निर्जन स्थान की तलाश करने लगे, जहां कोई न हो। तब उन्हें मिली अमरनाथ गुफा। इस बार अमरनाथ यात्रा 29 जून से शुरू होकर श्रावण पूर्णिमा अर्थात 13 अगस्त तक चलेगी।

भौगोलिक स्थिति

समुद्र तल से 13600 फीट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र अमरनाथ गुफा जम्मू-कश्मीर के उत्तर-पूर्व में स्थित है। 16 मीटर चौड़ी और लगभग 11 मीटर लंबी यह गुफा भगवान शिव के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। गुफा में बनने वाला पवित्र हिमलिंग शुक्ल पक्ष के दौरान बढ़ने लगता है, जबकि कृष्ण पक्ष में चंद्रमा के आकार के साथ ही इसका आकार भी घटने लगता है।

ऐतिहासिक महत्व

कल्हण की ऐतिहासिक पुस्तक राजतरंगिणी में अमरनाथ गुफा का उल्लेख मिलता है। इसका अस्तित्व 12वीं सदी से पहले का माना जाता है, परंतु मौजूदा दौर में इसकी खोज मुसलमान गड़रिये बूटा मलिक ने की थी। उसने सर्वप्रथम इस गुफा में प्राकृतिक हिमलिंग बनने की खबर सबको दी। आज तक बूटा मलिक के परिवार को अमरनाथ पर चढ़ने वाले चढ़ावे का एक हिस्सा दिया जाता है।

आध्यात्मिक आभास

सावन के महीने में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। आस्था, उल्लास, उत्सव और सेवा का समागम एक साथ दिखाई देता है। यात्रा शुरू होने से पहले ही मंदिरों का शहर जम्मू साधुओं का डेरा बन जाता है।

यात्रा मार्ग

यात्रा जम्मू से शुरू होती है। इसके दो मार्ग हैं। पहला मार्ग पहलगाम से, तो दूसरा बालटाल से शुरू होता है। श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड यात्रियों की सुरक्षा और सुगमता के लिए पहलगाम मार्ग से यात्रा करने की सलाह देता है। यह मार्ग लंबा, परंतु बालटाल की तुलना में कम जोखिम भरा है।

जम्मू से पहलगाम 315 किलोमीटर की दूरी पर है। जहां एसआरटीसी की बसों और निजी टैक्सियों से पहुंचा जा सकता है। पहलगाम से चंदनबाड़ी 16 किलोमीटर, चंदनबाड़ी से पिस्सु टॉप 3 किलोमीटर, पिस्सु टॉप से शेषनाग 9 किलोमीटर, शेषनाग से पंचतरणी 12 किलोमीटर और पंचतरणी से गुफा का रास्ता 6 किलोमीटर का है।

वहीं, दूसरे मार्ग में जम्मू से ऊधमपुर, काजीगुंड, अनंतनाग, श्रीनगर और सोनमर्ग होते हुए बालटाल पहुंचा जा सकता है। बालटाल से पवित्र गुफा महज 14 किलोमीटर की दूरी पर है। बालटाल से 2 किलोमीटर पर दोमेल, दोमेल से 5 किलोमीटर पर बरारी मार्ग, यहां से संगम 4 किलोमीटर और संगम से गुफा मात्र 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

सद्भाव का संगम

श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड की सदस्य प्रो. वेद कुमारी घई अमरनाथ यात्रा पर दिखने वाले धार्मिक सद्भाव से अभिभूत हैं। वे कहती हैं, 'यात्रा से जुड़े लोगों का धार्मिक सद्भाव देखकर मुझे बहुत खुशी होती है। वे चाहे पालकी और घोड़े वाले हों या फिर वहां टेंट लगाने और कंबल बांटने वाले, सभी अमरनाथ यात्रा की व्यवस्था देख रहे होते हैं। हालांकि वे सभी दूसरे धर्म के लोग होते हैं, लेकिन वे भी वर्ष भर इस यात्रा का इंतजार करते हैं।'


danik jagran

Thursday, February 10, 2011

नोकरी करने के कुछ नुस्खे

नोकरी करने के कुछ नुस्खे :

१) बने रहो पगले , काम करेंगे अगले !!!!

२)काम से रहो गुल , तनख्वाह पाओ फुल !!!!
...
३)मत लो टेंशन वरना परिवार पायेगा पेंशन !!!!

४)काम से डरो नहीं और काम को करो नहीं !!!!

५) काम करो या ना करो , काम की फिक्र जरुर करो;
और फिक्र करो या ना करो पर उसका जिक्र जरुर करो !!!!