Wednesday, April 15, 2009

रानीखेत (अल्मोड़ा)। देवीधुरा में होने वाले पाषाण युद्ध की तर्ज पर सिलंगी में भी कभी बग्वाल मेला होता था। लेकिन समय के साथ यह पाषाण युद्ध समाप्त हो गया है। अब सांकेतिक रूप में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए मेले का आयोजन होता है। मेले में मनोरंजन के लिए महिलाओं द्वारा झोड़े भी गाए जाते है। लगभग एक दशक पूर्व सिलंगी स्थित घाट के गधेरे में होने वाली अद्भुत परम्परा पाषाण युद्ध लुप्त हो गई है। अब पाषाण युद्ध ने मेले का स्वरूप ले लिया है। सिलंगी गांव के बुजुर्ग जीवन सिंह मेहरा ने बताया कि हाल ही के कुछ वर्षाें में यह परम्परा समाप्त हुई है। उन्होंने बताया कि यहां होने वाला पाषाण युद्ध दो धड़ों सिलंगी के फत्र्याल व पीपलखंड के मेहरा के बीच होता था। दोनों धड़े जब आमने-सामने होते थे तो उनके बीच में एक पत्थर (ओड़ा) रखा जाता था। जो धड़ा पत्थरों की बौछार के बीच इस पत्थर को छू लेता था वह धड़ा विजयी माना जाता था। मान्यता थी कि देवी को प्रसन्न करने के लिए यह युद्ध किया जाता था। कहा जाता था कि पाषाण युद्ध के दौरान जिस व्यक्ति को चोट लगती थी वह निरोगी हो जाता था और उसको इलाज की जरूरत नहीं होती थी। मेले के समाप्ति के बाद दोनों धड़े आपस में मिलजुलकर उत्सव मनाते थे। श्री मेहरा ने बताया कि अब यह पाषाण युद्ध नहीं होता है। बैसाख की पहली तारीख को होने वाले पाषाण युद्ध की जगह अब सिर्फ मेला होता है और झोड़े आदि गाकर देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। मौके पर मन्दिरों में ग्रामीणों द्वारा पूजा-अर्चना आदि की जाती है।

1971 लोकसभा चुनाव में लगा पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं की अंगुली पर निशान

पुराने समय में लोग सेवा भाव के साथ राजनीति में आते थे। तब आज के जैसी आपाधापी भी नहीं थी। चुनाव में सबकी नीयत साफ रहती और मतदान भी पूरी ईमानदारी से होता। लोग केंद्र पर आते और अपना वोट डाल कर लौट जाते। धीरे धीरे प्रत्याशियों और उनके समर्थकों की नीयत में बेईमानी समाने लगी। लोगों ने अपना वोट डालने के बाद दूसरे मतदाताओं के नाम से भी वोट डालना शुरू कर दिया। इस बदनियती से निपटने को वोट डाल चुके मतदाताओं की पहचान के लिये उनकी अंगुली पर निशान लगाया जाने लगा।

इससे पहले तक मतदाता सूचियों में दर्ज नाम के आधार पर ही वोट पड़ते थे। मतदान कर्मी सूची में वोट डालने वाले मतदाता के नाम पर निशान लगा लेते थे। जब लोगों ने बेईमानी कर दूसरों के वोट डालना शुरू किया तो मतदान केंद्रों पर झगड़े होने लगे। इन सब मुश्किलों से बचने और वोट डाल चुके मतदाताओं को पहचानने के लिये स्याही से निशान लगाने का चलन शुरू हुआ।

पांचवी लोकसभा के लिये वर्ष 1971 में कराये गये चुनाव में पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं की अंगुली पर निशान लगाया गया। इसके बाद बेईमानी करने वाले मतदाताओं ने मतदान केंद्र पर लगने वाले निशान को मिटाने के तरीके खोज लिये तो निशान लगाने के लिये अमिट स्याही का इस्तेमाल होने लगा। मतदाता की अंगुली पर निशान लगाये जाने से दोबारा वोट डालने वालों पर तो अंकुश लगा, मगर दूसरों के वोट डाल देने की शिकायतों में कमी नहीं आयी। इससे मतदाता के अधिकारों का हनन भी होता था।

टेंडर वोट
मतदाताओं के वोट डालने के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिये टेंडर वोट का तरीका अपनाया गया। जिन मतदाताओं का वोट कोई और डाल जाता वे अपना वोट टेंडर कर सकते हैं। ये वोट लिफाफे में अलग रखा जात और इनकी गणना भी सारे वोटों की गिनती के बाद जरूरत पड़ने पर ही होती है।

पांचवी लोकसभा के चुनाव से शुरू हुआ मतदाता की अंगुली पर निशान लगाने का चलन आज भी जारी है। इसमें बदलाव हुआ है तो सिर्फ इतना कि अब वोट डालने के बाद लगाये गये निशान को मिटाना आसान नहीं रहा।

Source: jagran.com

Thursday, April 9, 2009

फ्रॉड ई - मेल से बचने के 5 उपाय

ई - मेल के जरिये इस तरह फ्रॉड की घटनाएं और ऐसी कोशिशें तेजी से बढ़ रही हैं। यदि आप सोचते हैं कि आप इसका शिकार नहीं हो सकते हैं, तो आप गलत हैं। आइए हम आपको बताते हैं वे 5 टिप्स जिसकी मदद से आप ई - मेल फ्रॉड से बच सकते हैं.. .

1. इस तरह के फ्रॉड से बचने का सबसे पहला और जरूरी उपाय यह है कि आप अपने 2 ईमेल आईडी रखें। एक ऑफिशल और दूसरा पर्सनल। दोनों ही आईडी का पासवर्ड लंबा या बड़ा रखने की कोशिशि करें। पर ध्यान दें यदि आप यह सोचकर आसान पासवर्ड रखते हैं कि इसे आपको याद करने में आसानी होगी, तो आपके लिए खतरा भी है। साइबर हैकरों के निशाने पर सबसे ज्यादा आसान पासवर्ड ही होते हैं। पासवर्ड चुनते वक्त वर्ड और डिजिट का मिक्स हो काफी बढ़िया रहेगा। हां, पासवर्ड में अपना नाम, अपने पति/पत्नी का नाम, बच्चों का नाम, टेलिफोन नंबर और जन्मदिन का इस्तेमाल करने से हमेशा बचना चाहिए।

2. यदि आपको इस तरह के ई - मेल मिलते हैं कि 'आपने 50 हजार डॉलर जीत लिया है'या फिर 'आपने अमेरिकी ट्रिप जीत ली है' तो सतर्क हो जाएं। जाहिर तौर पर इसके पीछे को छिपी हुई चाल होगी। इस तरह के ई - मेल को देखकर लालच में आने की जरूरत नहीं है। ये मेल आपको खतरनाक साइट की ओर ले जाएंगे। यदि आप ऐसे मेल के बहकावे में आ गए तो इससे आप या तो अनजाने में वायरस डाउनलोड कर लेंगे या फिर अपने कंप्यूटर को हैकरों के हवाले कर बैठेंगे। इतना ही नहीं, यदि किसी अनजान पते से आपके पास कोई हॉट लिंक क्लिक करने का ऑप्शन आता है तो भी आप उसे खोलने की गलती न कर बैठें। ऐसे किसी भी मेल के जवाब में अपनी पर्सनल इन्फर्मेशन कभी भी न दें। यदि आप मेल की सचाई का पता लगाना चाहते हैं तो सेंडर की वेबसाइट का पता सीधे टाइप कर पता लगाएं, मेल का कोई जवाब न दें।

3. वायरस स्कैनिंग और रिमूवल के लिए अपने पीसी या लैपटॉप में सिक्युरिटी सॉफ्वेयर इन्सटॉल करें। अपने कंप्यूटर के सिक्युरिटी अपडेट लगातार चेक करते रहें। आपका सिक्युरिटी अपडेट जितना बेहतर होगा, खतरा उतना ही कम होगा। कंप्यूटर में एंटी-वायरस और एंटी स्पाईवेयर प्रोग्राम इन्सटॉल करना फायदेमंद रहेगा। कुछ सॉफ्टवेयर फ्री में उपलब्ध हैं। नॉर्टन एंटी-वायरस, McAfee और ट्रेंट माइक्रो जैसे सॉफ्टवेयर के लिए पे करना पड़ता है।

4. कई बार आपके पास किसी बैंक ने नाम से ई - मेल आते हैं, जिसमें आपसे आपकी पर्सनल इन्फर्मेशन मांगी जाती है। इस तरह के करीब 90 परसेंट ई - मेल फर्जी होते हैं। यदि आपको ऐसे ई - मल आते हैं तो आप इस पर रिस्पॉन्ड न करें। आप पहले उस URL ( वेब अड्रेस जिससे ई - मेल आया है) को सावधानी से चेक करें। कभी भी वैसे किसी व्यक्ति या वैसी किसी संस्था को ई - मेल पर अपनी पर्सनल इन्फर्मेशन न दें, जिसे आप जानते नहीं हैं। यदि आप ई - मेल पर पर्सनल इन्फर्मेशन दे रहे हैं तो हमेशा इस बात का ख्याल रखें कि जिस किसी को भी आप यह डीटेल दे रहे हैं, उसे डिटेल मुहैया कराना खतरनाक नहीं है।

5. साइबर कैफे ऑनलाइन क्रिमिनल्स के लिए हॉट स्पॉट होते हैं। लिहाजा साइबर कैफे से किसी को भी ई - मेल के जरिये पर्सनल डीटेल भेजने से परहेज करें। अपनी कोई भी फाइनैंशनल डीटेल, अकाउंट नंबर, पासवर्ड आदि भेजने से बचें। साइबर कैफे से निकलने से पहले इस बात की पूरी तरह जांच कर लें कि आपने जो भी ऐप्लिकेशंस खोले थे, उसे लॉग आउट कर दिया है। वैसे साइबर कैफे में जाने से भी परहेज करें, जहां वाई-फाई जैसे वायरलेस नेटवर्क का इस्तेमाल होता है, क्योंकि ऐसी जगहों पर प्राइवेसी और सिक्युरिटी कम होती है।
सोर्स:http://navbharattimes.indiatimes.com

Tuesday, March 31, 2009

आठों कौतिक धार्मिक मेला

चौखुटिया, अल्मोडा क्षेत्र का प्रसिद्घ धार्मिक मेला 'आठों कौतिक' बुधवार 1 अप्रैल से शुरू हो रहा है। इस बार यह मेला तीन दिनों तक चलेगा तथा इस दौरान प्रसिद्घ लोक कलाकार कुमाऊंनी व गढ़वाली लोक संस्कृति के रंग बिखेरेगे। साथ ही पारंपरिक लोक विधायें छोलिया नृत्य, छपेली, श्रंकार व भगनौल की प्रस्तुति देखने को मिलेगी। इसके लिये समिति द्वारा व्यापक तैयारियां चल रही है।

मेले का शुभारंभ 1 अप्रैल को 11 बजे प्रमुख मीना कांडपाल तथा जीएस मटियानी द्वारा दीप प्रच्चवलित कर होगा। इसके बाद बरलगांव महिला समूह द्वारा मैया की आरती के साथ ही झोड़ा-नृत्य वहीं लोक गायक हीरा सिंह राणा एंड पार्टी द्वारा रंगारंग कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी जायेगी। सायं अन्य टीमों की ओर से कार्यक्रम होंगे। दूसरे दिन सुप्रसिद्घ गायिका कल्पना चौहान व राजेन्द्र चैहान सहित अन्य स्थानीय कलाकार व स्कूली बच्चे अपनी प्रस्तुतियां देंगे।

मुख्य मेला 3 अप्रैल को लगेगा तथा मुख्य आकर्षक बलि प्रथा होगी। इस बार भटकोट थोक की ओर से नगाड़े निशानों के साथ बलि के लिये मेला स्थल पर भैंसा-जतिया लाया जायेगा तथा प्रथानुसार अगला बीड़ा उड़लीखान थोक द्वारा ग्रहण किया जायेगा। सायं पुरस्कार वितरण के साथ ही मेला को समापन होगा। इस बीच समिति के लोग व्यापक तैयारी में जुटे है।
जागरण.इन

Friday, March 27, 2009

हिमालय पर पड़ा ग्लोबल वॉर्मिंग का पहला असर

ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे पहला असर संभवत: हिमालय के ग्लेशियरों पर पड़ा था। एक नई स्टडी के मुताबिक 18वीं शताब्दी के मध्य से ही ये ग्लेशियर पिघलने शुरू हो गए थे। उत्तराखंड में प्रसिद्ध केदारनाथ धाम के पास चोराबारी ग्लेशियर में मोरैन की स्टडी करके विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंचे हैं। मोरैन मिट्टी और पत्थरों के इकट्ठा होने से बनते हैं। यह स्टडी वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के रवींद्र कुमार चौजर के नेतृत्व में एक टीम ने की है।

इन मौरेन में 2 हजार लाइकेंस (एक प्रकार का जीव) पाए गए। इन लाइकेंस का ग्रोथ रेट और वातावरण के संपर्क में आने के बाद इनके बढ़ने में लगने वाले समय से पता चलता है कि इस इलाके में मौसम में परिवर्तन 258 साल पहले शुरू हो गया था। चौजर ने दावा किया कि चोराबारी ग्लेशियर 14वीं शताब्दी के मध्य में बनना शुरू हो गया था और 1748 ई. तक यह प्रक्रिया चलती रही।
पीटीआई

Thursday, March 26, 2009

चार धाम यात्रा की तैयारियां

ब्रदीनाथ के कपाट 1 मई को खुलेंगे। चार धाम यात्रा की तैयारियों में प्रशासन जुट गया है। इन तैयारियों के लिये उपजिलाधिकारी ने सभी विभागों की बैठक बुलायी है। उनसे इस बैठक में कहा गया कि राष्ट्रीय राज्य मार्ग की व्यवस्थ दुरुस्त हो। चार धाम यात्रा के लिये प्रशासन सतर्क है।27 अप्रैल को गंगोत्री-यमनोत्री और 30 अप्रैल को केदारनाथ के कपाट खुल जायेंगे।
धाम यात्रा के लिए भले ही तैयारियां जोरों पर हों, लेकिन सचाई यह है कि इस बार मार्गो के बिना ठोस सर्वे किए ही यह यात्रा शुरू की जा रही है। बीते वर्ष इन मार्गो पर साढ़े पांच सौ से ज्यादा डेंजर जोन चिह्नित किए गए थे। इन्हीं के आधार पर सुरक्षा की तैयारी की जा रही है। पिछले यात्रा सीजन के बाद हुई बरसात में कई और नए स्थान डेंजर जोन के रूप में उभरे हैं, लेकिन इसकी जानकारी शायद ही विभाग के पास हो। ऐसे में चार धाम यात्रा कितनी सुरक्षित होगी, यह अंदाजा लगाया जा सकता है।

चार धाम यात्रा को कुछ ही समय रह गया है। इसके लिए संबंधित महकमों की तैयारियां जोरों पर हैं। बसों की व्यवस्था से लेकर सड़कों की मरम्मत के लिए परिवहन विभाग, लोक निर्माण विभाग व सीमा सड़क संगठन को निर्देश जारी कर दिए गए हैं, लेकिन इस वर्ष यात्रा से पहले यात्रा रूटों का ठोस सर्वे न तो पुलिस और न ही परिवहन विभाग ने किया है। अभी तक रूट प्लानिंग पुराने डेंजर जोन को ध्यान में रख कर ही की गई है। प्रतिवर्ष परिवहन विभाग और पुलिस अपने-अपने स्तर से चार धाम यात्रा रूटों का सर्वे कराकर तैयारी करते हैं। महकमे इसकी रिपोर्ट शासन को सौंपते हैं। रिपोर्ट में सड़को की स्थिति, चौड़ीकरण, पिटवाल, रेलिंग, पैराफिट आदि की स्थिति का उल्लेख होता है। इसी हिसाब से तैयारियां की जाती हैं। देहरादून-गंगोत्री, उत्तरकाशी- यमनोत्री, ऋषिकेश-सोनप्रयाग और हरिद्वार-बदरीनाथ मार्ग का सर्वे किया जाता है। हर वर्ष इन मार्गो पर डेंजर जोन की संख्या घटती-बढ़ती है। इससे रूट की स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इसी आधार पर तैयारियां की जाती हैं। इस वर्ष यात्रा मार्गो पर कितने डेंजर जोन घटे व बढ़े, इसकी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है। बीते वर्ष के हिसाब से ही तैयारियां की जा रही हैं। हालांकि अपर परिवहन आयुक्त विनोद शर्मा कहते हैं कि परिवहन आयुक्त व अन्य अधिकारियों के अलावा वे भी यात्रा रूटों की स्थिति का निरीक्षण कर चुके हैं। सीमा सड़क संगठन और लोनिवि को दस अप्रैल तक सभी कार्य दुरुस्त करने के निर्देश दिए जा चुके हैं।
सोर्स: इन जागरण.com

Wednesday, March 25, 2009

नैनीताल पर्यटन में सीजन में हनुमानगढ़ी में पार्क होंगी बसें


नैनीताल। पर्यटन सीजन में वाहनों की पार्किग समस्या से चिंतित प्रशासन ने नगर में नए पार्किग स्थलों की खोज शुरू कर दी है। डीएम हरिताश गुलशन व एसएसपी दीपम सेठ ने नगर के विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण कर पार्किग स्थलों के संबंध में विचार-विमर्श किया। तय किया गया कि हल्द्वानी रोड से आने वाले बड़े वाहनों को बस स्टेशन में सवारी उतारने के बाद हनुमानगढ़ी में पार्क किया जाएगा।

डीएम हरिताश गुलशन ने कहा है कि पर्यटन सीजन के दौरान पार्किग की समस्या को देखते हुए छोटे-छोटे पार्किग स्थलों का चिन्हीकरण किया जाएगा। उन्होंने भवाली रोड पर निर्माणाधीन बाईपास व फांसी गधेरे के अलावा फ्लैटं मैदान स्थित पार्किग में वाहनों को खड़ा करने की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए। चिड़ियाघर जाने वाले पर्यटकों की सुविधा के लिए माल रोड में इंडिया होटल के समीप टिकट काउंटर खोलने का निर्णय लिया गया। पर्यटकों को वहां से लाने व ले जाने की व्यवस्था की जाएगी। टिकट में टैक्सी किराया भी शामिल होगा।

एसएसपी दीपम सेठ ने कहा कि चिड़ियाघर मार्ग पर ट्रैफिक पुलिस की संख्या में बढ़ोत्तरी की जाएगी। इंडिया होटल के समीप खड़े वाहनों को पार्किग स्थलों पर भेजा जाएगा। डीएम के अनुसार फांसी गधेरे में कम से कम 20-25 वाहनों को पार्क करने के लिए पर्याप्त स्थान है। उन्होंने फांसी गधेरा के समीप भवन सामग्री डालने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने व वहां पर पार्किग बनाने के निर्देश पालिका प्रशासन को दिए है।