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Tuesday, March 24, 2009

अल्मोड़ा के नौले

चंद राजाओं की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक परंपराओं व धरोहरों को समेटे अल्मोड़ा नगर कभी नौलों के नगर के नाम से जाना जाता था। घोड़े की पीठ के आकार में बसे इस नगर के दोनों ओर प्राकृतिक जल स्रोत के 110 छलकते स्वच्छ व निर्मल जल से परिपूर्ण नौले हुआ करते थे।

विकास की अंधी दौड़ व समय की मार ने अधिकांश नौले नेस्तनाबूद से कर दिए हैं। अब बमुश्किल पूरे नगर में 20 नौले शेष हैं। अधिकांश नौलों का पानी इतना दूषित हो चुका है कि वह पीने योग्य ही नहीं रहा है। ऐसा ही एक नौला है जो रम्फा नौला के नाम से जाना जाता था। जिसमें शैल ग्राम से पानी छोड़ा गया था। इसका निर्माण 1887 में बद्रेश्वर जोशी द्वारा बद्रेश्वर के शिव मंदिर के निर्माण के साथ किया गया था। इस बात का खुलासा पर्वतीय जल स्रोत के लेखक प्रफुल्ल कुमार पंत ने 1993 में नौलों पर लिखी गई पहली पुस्तक में किया है।

नगर के नौलों के शोधकर्ता प्रफुल्ल कुमार पंत का कहना है कि पूर्व में नगर के आसपास व नगर में प्राकृतिक रूप से संपन्नता थी। विभिन्न प्रजाति के पेड़-पौधे थे। जिसके कारण नगर के हर ढाल में प्राकृतिक जलस्रोत बिखरे हुए थे। जिनमें से कुछ नौलों का निर्माण तत्कालीन चंद राजाओं ने कराया। तो कुछ का निर्माण नगर के संपन्न परिवार के लोगों ने किया था। लेकिन वनों के कटान के साथ ही धीरे-धीरे जलस्रोत सूखने लगे। जिसके कारण नौले अनुपयोगी होते गए और लोग उन्हें भूल गए।

दूसरी ओर विकास की दौड़ के साथ जगह-जगह बने सीवरेज टैंक के कारण बचे नौलों का पानी दूषित हो रहा है। यदि नगर में विधिवत सीवरेज लाइन की निकासी बनाई जाए तो परीक्षण के बाद बचे नौलों का पानी पीने योग्य हो सकता है। उन्होंने कहा कि जब तक सीवरेज की विधिवत व्यवस्था नहीं की जाती तब तक नौलों के भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। उनका कहना है कि घटते नदियों के जल स्तर को देखते हुए जरूरी होगा कि परंपरागत जलस्रोतों के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाया जाए।
नौले को बचाने के लिए हम लोगो को भी आगे आना पड़ेगा और सभी को जागरुक करना पड़ेगा तभी हम अपने उत्तराखण्ड की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक परंपराओं व धरोहरों को समेटे इन नौलों को बचा सकते है।